धर्म पर चर्चायें तो बहुत हो चुकी हैं और मैने अक्सर अपने आप से ये कहा हैं कि धर्म सिर्फ इतना ही हैं कि देश काल समय और परिस्थितियों के अनुसार जो कुछ भी करना उचित हो उस समय का वही धर्म हैं और यथोचित कर्म और व्यवहार करना ही धर्म पालन । दुसरे शब्दों मे कहें तो आपका कौन सा कर्म और व्यवहार कब धर्म और कब अधर्म कहलायेगा ये निर्णय सिर्फ काल ही निर्धारित कर सकता हैं । कर्म निरपेक्ष हो तो उसका कोई अर्थ नही हैं । कर्म जब काल या समय के साथ जुड़ता है तभी उसका कुछ निहितार्थ हो सकता हैं । योग का अर्थ हैं जुड़ना या समत्व । जब कोई भी चीज किसी दुसरी चीज से जुड़ कर समता पर आती हैं तो यही योग कहलाता हैं । सामान्य व्यक्ति भी ये बात जानता हैं कि सही जोड़ के लिये सही मिलान के लिये दोनो को समतल यानि कि leval होना कितना जरूरी हैं । अर्थात कर्म का काल से योग, जिससे उसका कोई अर्थ निकले, कर्मयोग हैं । तो अब बात कितनी सरल हो गयी की सही समय पर किया गया कर्म धर्म और कुसमय किया गया कर्म अधर्म ।
".. हमारे दिल से आपके दिल तक ,/ बात निकली है तो जायेगी दूर तक ,/ ये 'किरण'जो चली है यहाँ से वहाँ तक ,/ रौशनी कर देगी वहाँ , पहुँचेगी जहाँ तक । " ----------- अश्विनी कुमार तिवारी
Wednesday, November 23, 2011
वृक्ष और हम
बेटी के स्कूल मे एक बडा पेड़ काटा गया हैं जो संभवतह सूख गया था । पर मेरी पांच साल से कुछ बड़ी बेटी के लिये तो ये पहला ही अनुभव था । आज सुबह स्कूल छोड़ते समय वो बोली '' पापा आपको पता है हमारे स्कूल मे पेड़ काटा गया हैं , आज एक कटा फिर दूसरा कटेगा बाद मे सारे पेड़ कट जायेंगे और हमारा स्कूल नंगा हो जायेगा .... हा हा हा ! '' मैं स्तब्ध हो गया और उसकी शक्ल देखने के सिवा कुछ नही बोल सका !
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विचार प्रवाह
Friday, November 18, 2011
शिव तांडव स्त्रोत्रम्
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थलॆ
गलॆवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनॊतु नः शिवः शिवम् ॥ 1 ॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
-विलॊलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकॆ
किशॊरचन्द्रशॆखरॆ रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥
गलॆवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनॊतु नः शिवः शिवम् ॥ 1 ॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
-विलॊलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकॆ
किशॊरचन्द्रशॆखरॆ रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥
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श्लोक
Sunday, October 16, 2011
हिन्दी व्याकरण : वर्ण विचार , भाग ( दो )
वर्णों का वर्गीकरण
वर्णों के दो मुख्य भेद हैं – (1) स्वर और (2) व्यंजन ।
स्वर : उन वर्णों को कहते हैं, जिनका उच्चारण स्वतंत्रता से होता है और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक होते हैं । अ इ उ आदि स्वर हैं । हिन्दी मे स्वरों की संख्या ग्यारह है – अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ ।
व्यंजन : वे वर्ण हैं, जिनके उच्चारण में स्वरों की सहायता आवश्यक होती है । स्वरों की सहायता लिये बिना व्यंजनों का उच्चारण सम्भव नही है । इनकी संख्या 33 हैं :
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हिन्दी
Sunday, October 9, 2011
हिन्दी व्याकरण : वर्ण विचार , भाग ( एक )
वर्ण विचार
साधारणतः लोग ध्वनि , अक्षर और वर्ण का एक ही अर्थ ले लेते हैं । व्याकरण के अनुसार इनमे अर्थ भेद हैं ।
ध्वनि :- यह भाषा का लघुतम श्रव्य – खण्ड है । जैसे अ, ई । पर यह उच्चार्य – खण्ड हो ही यह आवश्यक नही । स्वर रहित व्यंजन प्रायः उच्चारित नही होते । श्रवणीयता ध्वनि का साधारण धर्म हैं ।
अक्षर :- यह भाषा का लघुतम उच्चार्य – खण्ड है । सभी स्वर , सभी स्वर-युक्त व्यंजन अक्षर हैं । जिस ध्वनि या ध्वनि-समूह का उच्चारण एक श्वासाघात में हो उसे अक्षर कहते हैं । जैसे : मा, मो, मू , अ आ । सभी स्वर ध्वनि और अक्षर दोनो हैं । सभी व्यंजन स्वतंत्र रूप से ध्वनि हैं , अक्षर नही क्योंकि वे स्वतंत्र रूप से उच्चार्य नही हैं । व्यंजन अक्षर तब बनता हैं जब उसके साथ स्वर जुड़ा रहता हैं । अक्षर में एक से अधिक ध्वनियाँ हो सकती हैं । एक ध्वनि का अक्षर केवल स्वर हो सकता हैं , व्यंजन नही ।
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हिन्दी
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