Saturday, February 11, 2012

यादोँ का कारवाँ

              यादोँ का कारवाँ

 

हम  याद  आयेँ  ना  आयेँ  ,  आप याद आयेँगे ,
साथ गुजारे गए मधुर स्मृतियों के सुहाने पल ,
सपनों  और  विचारों   की   लड़ी  के  दरमियाँ ,
चुपके  से  दाखिल  हो  साथ - साथ हो जायेंगे ।

Wednesday, February 1, 2012

हिन्दी व्याकरण : वर्ण विचार , भाग (पाँच )


वर्णों का उच्चारण स्थान
मुख के जिस स्थान से जो वर्ण या ध्वनि निकलती है , वह भाग उसका उच्चारण स्थान है ।

उच्चारण स्थान के आधार पर हिन्दी मे स्वरों के निम्नलिखित भेद हैं :
1.       कण्ठ्य – अ , आ ।
2.       तालव्य – इ , ई ।
3.       मूर्द्धन्य ( तालु का ऊपरी भाग ) – ऋ , ॠ ।
4.       दन्त्य – ऌ , ॡ ।
5.       ओष्ठ्य – उ , ऊ ।
6.       कण्ठ-तालव्य – ए , ऐ ।
7.       कण्ठोष्ठ्य – ओ , औ ।

Monday, January 30, 2012

स्वतंत्रता और गणतंत्र



26 जनवरी आई और आ कर गई भी । तो आजकल स्वतंत्रता और गणतंत्र के बारे मे सोच रहा हूँ । आप तो जानते ही है कि मेरे दिमाग मे कब कौन सी बात आ जाये मै खुद नही जान पाता । वैसे भी कहा जाता है कि " जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि " । अब महान कवि होने का दावा तो नही करता पर मन और दिमाग जरूर कवियों की तरह सोचता हैं । नतीजा व्यवहारिक बुद्धि पर अक्सर भाव प्रधान बुद्धि हावी हो जाती है । अब ये भी तय है कि अपनी हर एक सोच हरएक के साथ तो साझा नही कर सकता न ही करना चाहिये । अपनी कुछ सोच मै आपके साथ भी साझा करके अच्छा महसूश करता हुँ । 

Thursday, January 19, 2012

हिन्दी व्याकरण : वर्ण विचार , भाग (चार )


हिन्दी के व्यंजन वर्ण
हिन्दी व्यंजनो की संख्या 33 है । इन्हे निम्नलिखित वर्गों में बाँटा गया है : 
1.)    स्पर्श व्यंजन या वर्गीय : पाँच – पाँच व्यंजनों का एक – एक वर्ग है । वर्गों की संख्या पाँच है । इस तरह कण्ठ , तालु , मुर्द्धा , दाँत  और ओठ से बोले जाने के कारण इन्हें स्पर्श व्यंजन कहा जाता है । इन्हे वर्गीय व्यंजन भी कहा जाता है । ‘क्’ से ‘म्’ तक के वर्णों को स्पर्श व्यंजन कहते हैं ।

Monday, January 16, 2012

कोशिश

                  कोशिश


सेतुबन्ध  था  हो   रहा  और  राम  खड़े  निहार ,
सोच रहे थे व्यापकता थी उदधि की अपरम्पार ।
याद  आया  वो समय  याचना की  थी बारम्बार ,
किंतु बिना भय प्रकटा नही सिन्धु वहाँ साकार ॥

                                    सोच रहे हा ! सीता सुकुमारी मैं हूँ कितना लाचार ,
                                   ब्रम्हाण्ड पलटने की शक्ति पर मर्यादा का बिचार ।
                                   तारतम्य   टुटा   तभी   औचक   हीं   कुछ  निहार ,
                                  एक गिलहरी तन्मयता से डाल रही कंकड़ हर बार ॥