Thursday, April 20, 2017

रत्नावली



रत्नावली
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ओह वो चले गए ! चले ही जाना चाहिए था उन्हे ! मैंने भी तो कैसे बात किया था ! कितना प्यार था उन आँखों मे मेरे लिए ... नही नही प्यार नही आसक्ति थी तभी तो ... ! नही नही प्यार ही रहा होगा ! मैं ही अनर्थ तो नही सोच बैठी थी ..... ना ना ... हा हा .. स्वत: भुन भुना रही थी वो सितकेशी ! श्वेत धवल स्निग्ध केश के बीच एक सिंदूर की गाढ़ी रेख विवाहित होने का संकेत कर रही थी ! सबने हमेशा अपनी झोपड़ी में अकेले ही देखा था ! नित पूजा पाठ भजन ! कभी कोई हाल चाल भी नही पूछने वाला ! कभी कभी अकेले मे कुछ बुद्बुदाती भी रहती थी ! चेहरे पर कभी विषाद तो कभी गर्व कभी हास्य की रेखाएँ आती जाती रहती है पर क्या इतना आसान है उन आँखों मे लहराते समन्दर के परे देख पाना ! आँग मे लगे तुलसी के पौधे की सेवा बड़े जतन से करती थी ! कभी कभी तो घंटों वही निकल जाते ! कब सुबह से दोपहर हुई  कुछ जैसे भान ही नही रहता ! जब तुलसी के पौधे में मंजरियाँ निकल आती तो उसकी खुशी देखते ही बनती है ! कई बार मन मे प्रश्न सा उठ खड़ा होता है कि कौन है आखिर क्या इसका कोई नही है ! झुर्रियों के चेहरे के पार अगर देखें तो लगता है कि किसी समय मे इनकी सुंदरता का जोड़ा नही होगा ! शायद कोई अप्सरा या गंधर्वकन्या या कोई यक्षणी ... शायद कोई शाप के कारण जैसे पथभ्रष्ट हो धरती पर आ गई होगी ..... ! आज भी इस चेहरे की आभा से बच पाना इतना आसान नही है !

Wednesday, February 1, 2017

~॥०॥ प्रार्थना ॥०॥~


‍‍~ माँ तु शारदे वर दे वर दे ~

 माँ तु शारदे वर दे वर दे ,
                          बुद्धि विवेक से भर दे ।
चाहे हो विपरीत परिस्थिति ,
                        स्वाभिमान का स्वर दे ॥

नए राग कुछ नयी रागिणी ,
                        नए स्वर शब्द्‌ सुघर दे ।
साँसो की लय ताल वृत्ति को ,
                       स्फूर्ति नवल नव सुर दे ॥

अज्ञान तिमिर घन कर प्रच्छन्न्‌ ,
                       ज्ञान उदित दिनकर दे ।
अहंकार दानव विशाल का ,
                     शीश अवनि पर धर दे ॥

न्यायोचित सत्कर्म हमारे ,
                         अनुशासन सत्वर दे ।
मनवीणा को कर दे झंकृत ,
                    कोकिल सा मधु स्वर दे ॥


------- अश्विनी कुमार तिवारी , वसंत पञ्चमी , ०१-०२-२०१७

Saturday, January 14, 2017

उनीदी भोर





उनीदी भोर
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माथे पर उगता सा सूरज ,
कान्धे पर है रात विभोर ।
सपनों की प्राची से जगती ,
कैसी सुघड़ उनीदी भोर ॥

Sunday, January 1, 2017

नए वर्ष का आना जाना



नए  वर्ष  का आना  जाना


नए  वर्ष  का आना  जाना , कितने  हीं जज्बात  लिखे ।
अरमानों  के दीप  जलाकर , सपनो  की  सौगात  बुने ॥

जब आया था वही ललक थी , वही  पुलकती  थी काया ।
अंतरतम  के  दीप वही  थे , वही स्वप्न  सजती माया ॥
सुख दु:ख के ताने बाने सा , करघे का घर-घर नाद सुने ।
समय चक्र की बलिवेदी पर , अर्पित अतीत का राग गुने ॥

Wednesday, September 14, 2016

हमारी राजभाषा हिंदी भाग 6



हमारी राजभाषा हिंदी भाग 6

आज एक प्रश्न पूछने की इच्छा हो रही हैं ! क्या स्वक्षंदता से विकास सम्भव है ? हो सकता है कि कुछ व्यक्ति विशेष विकास कर जाएँ पर वो उनका अत्म संयम हो सकता है आत्मानुशासन हो सकता है पर बहुसँख्यक का क्या क्या ऐसी परिस्थिति अराजकता की ओर नही धकेल देती !
हमारी राजभाषा हिंदी भी कुछ इन्ही अराजक परिस्थितियों से गुजर रही हैं ! भारत के जिस हिस्से में हिंदी प्रमुखता से बोली जाती है वहाँ बस लोग हिंदी स्वभावत: बोलते है कोई पढ़ने या समझने की चेष्टा के बारे में सोचता ही नही है ! यहां तक कि जिनकी रोजी रोटी व्यवसाय भी हिंदी से जुड़े है वो भी हिंदी को गम्भीरता से लेना अपनी तौहीन समझते हैं ! हिंदी पट्टी के अन्तरगत बोली जाने वाली बिभिन्न भाषाओं को बोलने वाले प्रबुद्ध वर्ग अपनी मातृभाषाओं के कम होते व्यवहार या गिरते स्तर के लिए हिंदी को ही कहीं न कहीं जिम्मेदार मानने लगे हैं !