Friday, June 12, 2015

प्रभु तुम अविनाशी

भजन :- प्रभु तुम अविनाशी
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प्रभु तुम अविनाशी , दिव्य प्रकाशी ,
बिघ्न विनाशक हर्ता ।
मैं मनुज विलासी , भूमि प्रवासी ,
अहंकार घट भर्ता ॥

Sunday, April 26, 2015

वृक्षों का सन्देश



               वृक्षों का सन्देश


हम  फेफड़े , हैं  इस  धरा  के ।
हमसे हीं जीवन , हैं इस धरा पे ॥

                        हमने दिया हैं इस जग को खाना ,
                        हमसे चहकता हैं  सारा जमाना ।
                        बसेरे दिये  सभ्यताओं को हमने ,
                        बरसते हैं बादल हमीं से धरा पे ॥

Friday, March 13, 2015

मोर का नृत्य

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मोर का नृत्य
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ले पंख नोच न कहीं मेरा ,
सुन्दरता पर मोहित मानव ।
हैं भला इसी में बिधि मेरा ,
लूँ खिसक विथि वन हो लाघव ॥

Thursday, January 8, 2015

गोसाउनीक गीत

                      गोसाउनीक गीत

जय जय भैरवि असुर भयाओनि ,
पसुपति भामिनि माया ।
सहज सुमति वर दिय हे गोसाओनि ,
अनुगति गति तुअ पाया ॥

अर्थ – हे ! असुरों और आसुरी वृत्ति को भय प्रदान करने वाली माँ भैरवी ! काली ! तुम्हारी जय जयकार हो । तुम्हारी जय हो क्योंकि जो कुछ भी हैं वो सब शिव प्रिया शिवपत्नी की हीं माया हैं लीला हैं कल्पना स्रृष्टि हैं । हे गोसावनि ! आप मुझे ऐसी सहज , नैसर्गिक , स्वभाविक सुन्दर चित्त , मन , बुद्धि का वर प्रदान करिये ताकि मुझे आपकी ही गति मिले अर्थात मैं आप मे हें समाहित हो जाऊँ ।

Thursday, January 1, 2015

फिर से इक साल, नया और, चला आया हैं ।

फिर से इक साल, नया और, चला आया हैं ।

फिर से इक साल, नया और, चला आया हैं ।
स्वप्न आँखों में, मन में फूल खिला डाला हैं ॥
बीते सालों की उम्मीदों को, परवान नया देने ।
फिर से इक साल, नया दौर, चला आया हैं ॥

फिर से इक साल, नया और, चला आया हैं ।
स्वप्न आँखों में, मन में फूल खिला डाला हैं ॥