Saturday, October 20, 2012

फिर भी !


           फिर भी !
  
परिवर्तन  संसार  का  नियम  हैं , और  जड़त्व  भी ,
नये निर्माण को टूटती है जड़ता , तो होता है कष्ट भी ।
कोई नही जानता टूटते वक्त , विनाश है  या सृजन भी ,
कष्ट से गुरजते हुए आगे , मिले कहीं , कोई खुशी भी ॥

Friday, September 21, 2012

गुजारिश



       गुजारिश

हमारी  आदतें  पहले   बिगाड़ते   क्यूं  हो ,
अपनी  जड़ों  से   हमें   उखाड़ते  क्यूं  हो ,
चढ़ा  कर  पेड़  पर  ऊचें  सनम  जी  क्यूं,
सीढ़ी  सब्सीडी  की  हटाते  भला  क्यूं  हो ?

गाड़ियां  सस्ती  हुई  जाती  है दिन पर दिन ,
तेलों  के  दाम  इतने  बढ़ाते  जाते  क्यूं हो ,
बनाओ  बड़े  मॉल  हमे न  शिकवा शिकायत ,
पर  ठेले  चाय  सब्जी के  यूँ हटाते क्यूं हो ?

Friday, September 14, 2012

हमारी राजभाषा हिन्दी भाग 2


हमारी राजभाषा हिन्दी
सम्विधान का अनुच्छेद 343(1) बड़े ही गरिमा से उद्घोष करता है , “ संघ की राजभाषा हिन्दी और उसकी लिपि देवनागरी होगी । संघ के प्रयोजनो के लिये प्रयोग होने वाले अंको का रूप भारतीय अंको का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा । “
आज इस घटना के करीब 62 साल बीत गये पर आज भी हमारी संघ की राजभाषा ‘हिन्दी’ ,  ‘अनुच्छेद 343(2)’ , ‘राजभाषा अधिनियम 1963 ,  यथा संशोधित 1967 , की धारा 3(3)’ के बनाये चक्रव्युह से अभी भी निकल नही पाई हैं । निकट भविष्य में भी इस घुटन से निकल पायेगी ऐसी सम्भावना दूर दूर तक दिखाई नही पड़ती हैं । हमारे नीति निर्धारकों ने हिन्दी को चक्रव्युह में घुसा तो दिया बड़ी आसानी से पर इस तिलस्म से निकलने का जो रास्ता बना रखा है वो 62 साल बाद भी सपने जैसा ही हैं ।

Tuesday, July 24, 2012

नासतो विद्यते भावो ......


नासतो विद्यते भावो ......

सच और झूठ को जानने का एक मात्र पैमाना है , परिस्थितिओं और अपने विवेक का मेल । सच और झूठ साथ - साथ ही चलते हैं । सच भले ही कभी कभी सच जैसा ना लगे पर अच्छा झूठ वही होता है जो बिलकुल सच लगे । झूठ की ताकत उसके सच लगने मे ही है । अच्छा झूठ सच के जैसा और महिमामण्डित होता है साथ ही साथ तार्किक भी । सच छोटा सरल और सुगम होता है और बहुत कम लोग उसे सच मान पाते हैं । सच जानते हुए भी साबित करना दुश्कर है किंतु झूठ यानी बनाया हुआ सच आसानी से साबित हो जाता है । ध्यान रख्खें कि हजारो के सामने भी कोइ एक सच्चा हो सकता हैं । अपने दिल पर हाथ रख्खें और सच का साथ दें ।

Saturday, June 16, 2012

हिन्दी व्याकरण : वर्ण विचार , भाग (छः )


बलाघात ( स्वराघात )
बोलने में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि वाक्य के सभी अंशो पर बराबर बल या जोर नही दिया जाता । कभी वाक्य के एक शब्द पर जोर अधिक होता है तो कभी दूसरे पर । इसी प्रकार एक शब्द की ध्वनियों पर भी बराबर बल या आघात नही पड़ता । शब्द जब एक अक्षरों का होता है तो इन अक्षरों पर भी बल बराबर नही पड़ता , किसी पर कम किसी पर ज्यादा । इसी बल , जोर या आघात को ‘ बलाघात ‘ कहते हैं । भाषा की कोई भी ध्वनि पूर्णतः बलाघात शून्य नहीं होती ।