Thursday, January 8, 2015

गोसाउनीक गीत

                      गोसाउनीक गीत

जय जय भैरवि असुर भयाओनि ,
पसुपति भामिनि माया ।
सहज सुमति वर दिय हे गोसाओनि ,
अनुगति गति तुअ पाया ॥

अर्थ – हे ! असुरों और आसुरी वृत्ति को भय प्रदान करने वाली माँ भैरवी ! काली ! तुम्हारी जय जयकार हो । तुम्हारी जय हो क्योंकि जो कुछ भी हैं वो सब शिव प्रिया शिवपत्नी की हीं माया हैं लीला हैं कल्पना स्रृष्टि हैं । हे गोसावनि ! आप मुझे ऐसी सहज , नैसर्गिक , स्वभाविक सुन्दर चित्त , मन , बुद्धि का वर प्रदान करिये ताकि मुझे आपकी ही गति मिले अर्थात मैं आप मे हें समाहित हो जाऊँ ।

Thursday, January 1, 2015

फिर से इक साल, नया और, चला आया हैं ।

फिर से इक साल, नया और, चला आया हैं ।

फिर से इक साल, नया और, चला आया हैं ।
स्वप्न आँखों में, मन में फूल खिला डाला हैं ॥
बीते सालों की उम्मीदों को, परवान नया देने ।
फिर से इक साल, नया दौर, चला आया हैं ॥

फिर से इक साल, नया और, चला आया हैं ।
स्वप्न आँखों में, मन में फूल खिला डाला हैं ॥

Wednesday, December 24, 2014

गाँव :- एगो सपना



         गाँव :- एगो सपना
रामचरन : -
ए भकभेलरा ! तनी बतावते गाँव घर के हाल ।
खेत पथारी कईसन बाटे का काका के हाल ॥
गाछ विरिछ गोरू बछरू और पनघट के हाल ।
खेलत होईहें लईके लईकी का बा सब खुसहाल ॥

बड़ा मन करेला हमके फेर छोट होई जईंती ।
खुब चुभकतीं पोखरा में आ खेलत पढ़े जईंती ॥
झुठ बोल के भागल करतीं स्कूलवा से रोज ।
और घुस के खुब चोरा के गन्ना चाभल करतीं ॥

Tuesday, December 23, 2014

--------------------- मैथिली -------------------



---------------------         मैथिली     -------------------

मैथिली सन मीठ मधुकर , के भी नञि छयि मधु रे ।
नञि रसालक रस ओते , बस माय के छयि कोड़ रे ॥
मैथिली सन प्रीत नेहगर , नञि छयि प्रिया के प्रीत रे ।
नाहि भौतिक नाहि आत्मिक , नाहि स्वर्गक वास रे ॥
मातृभाषा केँ बिसरि , जँ चाहबै उन्नति करी ........ ।
आत्मा के शांति मन के , नञि बचत किछु पास रे ॥

         ........... अश्विनी कुमार तिवारी ( 23/12/2014 )

Friday, December 19, 2014

आओ तुझको सुनाऊँ .....



      आओ तुझको सुनाऊँ .....

आओ तुझको सुनाऊँ , मैं कविता प्रिये ।
जिसमे छवि हो तुम्हारी निखरती प्रिये ॥

भोर की लाली  सिन्दूरी  थोड़ी लिए ,
रात की चाँदनी  सी  चमकती हुई ।
रात रानी की खुशबू सा मँहका हुआ ,
दिव्य ज्योती सा तेरा वदन हैं प्रिये ॥